किसी समय की बात है , एक जंगल में एक विशाल ओक का वृक्ष था । अकडू ओर घमंडी ओक को अपनी शक्ति का बहुत घमंड था । पास ही एक नदी बहती थी । उसके किनारे पर कुछ सरकंडे उग आए थे । हवा चलती तो सरकंडे आराम से झूमा करते थे । एक दिन खूब हवा चली । ओक अपनी जगह अकड़ा हुआ खड़ा रहा , झुकना तो दूर हिला भी नहीं । सरकंडा झुक गया और हवा को जाने दिया । ओक ने उसकी हंसी उड़ाई और कहा , “ तुम कितने कमजोर हो ... जब भी हवा चलती है तो तुम्हें झुकना पड़ता है । " सरकंडे को बुरा लगा पर उसने हिम्मत नहीं हारी । बोला , “ हाँ , मैं तुम्हारी तरह विशाल नहीं हूँ पर सुरक्षित हूँ । " फिर एक रात जोरों का तूफान आया तेज हवा चली और खूब बारिश हुई । ओक का पेड़ जड़ से उखड़ गया पर सरकंडे ने नीचे झुककर अपनी जान बचा ली । शिक्षाः स्वयं को स्थिति के अनुरूप ढालने में ही भलाई है ।

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