धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्रों ने शहर जाकर अच्छा धन कमाया । वापस आकर उन्होंने धन को सुरक्षित रखने के लिए जमीन में गाड़ दिया ।
  Raja-Aur-Bandar-Panchtantra-ki-Kahani 

एक रात पापबुद्धि के मन का चोर जागा और उसने सारा धन चुरा लिया । चोरी का दोष धर्मबुद्धि पर मढ़ दिया । न्याय के लिए वे राजा के पास गए । पापबुद्धि ने कहा कि जंगल के राजा ने धर्मबुद्धि को चोरी करते देखा था । 


अगले दिन राजा का न्याय होना था । पापबुद्धि ने अपने पिता से कहा , आप बड़े पेड़ के पीछे छिप जाएँ और जब पूछा जाए कि चोरी किसने की तो धर्मबुद्धि का नाम लें । " अगले दिन दोनों मित्र और राजा उस गड्ढे के पास गए जहाँ धन गाड़ा था । 


“ चोरी किसने की " , राजा के पूछने पर आवाज आई , “ धर्मबुद्धि ” । धर्मबुद्धि को संदेह हुआ और उसने पेड़ के पीछे छिपे हुए पापबुद्धि के पिता को बाहर निकाल लिया । राजा ने पापबुद्धि को सजा दी । 


शिक्षा : छल कभी फलीभूत नहीं होता है ।

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